Wednesday, 12 August 2015

कविता १३०. कुछ चीजों का किनारा

                                     कुछ चीज़ों का किनारा
जब जब हम आगे बढ़ जाये कुछ पीछे तो छूट ही जाता है मन नादान परिंदा होता है जो आगे भी बढ़ जाता है
जीवन के हर राह पर कोई ना कोई दिख जाता है जिसे साथ लेना चाहते थे पर वह इन्सान पीछे ही रह जाता है
जीवन की यह कश्ती जाने क्यू छोटीसी ही लगती है जो जीवन को जाने कितने राहों पर उम्मीदें भी देती है
पर अफ़सोस तो इन बातों का है की फिर भी कुछ ना कुछ छूट ही जाता है जब जब हम सबकुछ साथ लेना चाहते है
तो सबकुछ छुटता ही नज़र आता है इस जीवन को तो कुछ किनारों पर कभी कभी कुछ छोड़ना भी अच्छा लगता है
सारी चीज़ें साथ ले न सके हम मुश्किल से कुछ साथ ले पाते है उन चीज़ों को साथ रख कर आगे बढ़ जाना अच्छा लगता है
जीवन जितना दे सकता है उसमें ही कभी कभी मनाना पडता है जो पाया है उसमें ख़ुश रहना ही सीखना पड़ता है
सबकुछ तो हम पा लेते है पर साथ सब रखनाh नहीं हो पाता है क्यूकी इस जीवन का हर सपना एक साथ नहीं देखा जाता है
आगे तो बढ़ते जाना है पर पीछे छूटी  चीज़ों को भुलाना नहीं अच्छा लगता है पर भुला देते है हम उनको क्यूकी सब खो देना उस से भी बुरा लगता है
तो पीछे जो चीज़ें दिलको छूती है उनको भुलाना आता है कश्ती को डुबाने से कुछ चीज़ों का किनारा बनना अच्छा है

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