Wednesday, 2 September 2015

कविता १७२. जंजीरे

                                                                          जंजीरे
बांध सके हमारी उम्मीदों को ऐसी जंजीरे बनी नहीं जो उम्मीदों के ताकद से आगे बढ़ जाये ऐसी मंज़िले ही है बनी हुई
जो जीवन में चलना सीखे रुकना उसकी फितरत कभी बनी नहीं जो इन्सान तुफानों से लढने की थाने रुकना उसकी मंज़िल नहीं होती
लढ जाये जो गमों से जिन्दगी उसके लिए जन्नत से कम नहीं होती क्योंकि जिन्दगी का मतलब जानने से जिन्दगी कम नहीं होती
हर किताब को पढ़ने से कहानी खत्म नहीं होती वह बार बार दोहराने पर भी फिर से जीवन मे शामिल कुछ इस तरह से है होती
जीवन मे वह कहानी दोहराई सी कभी भी नहीं लगती कितनी बार बांधो जंजिरे खत्म नहीं होती
पर हर बार छूटने की चाहत जीवन मे कम नहीं होती बस उम्मीदों की तलाश होती और उसकी रेहमत से वह कम नहीं होती
जिसे तलाश ने की आदत हो उनके लिए जीवन की ख़ुशियाँ कम नहीं होती उन्हीं के उम्मीदों मे जीवन की राह कभी नहीं रुक सकती
बार बार जीवन के अंदर जंग कर के हक़्क़ माँगने की चाहत खत्म नहीं होती वह अभी भी जिन्दा है वह कम नहीं होती
जीवन मे जो जंजिरे तोड़ने की जो चाहत मन मे जिन्दा होती है वह हक़ माँगे कभी कम नहीं होती
क्योंकि जो एक बार चलना सीख लेते है उनकी चलने की आदत कभी जीवन मे बंद नहीं होती कोई ज़ंजीर उन्हें रोकने के लिए काफ़ी नहीं होती

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