Sunday, 6 December 2015

कविता ३६०. हाथ कि लकीरे

                                           हाथ कि लकीरे
हाथ जो जीवन कि लकीरे दिखा जाते है उनमें ही हम हर बार उम्मीदें बाँध के रखते है हाथ जो जीवन कि लकीरे बताते है काश हम उन्हें समज लेते क्योंकि तभी तो हम जीवन को समज पाते है
हाथों कि लकीरों से ही तो जीवन के धागे उलझते जाते है जिन्हें समज लेने कि चाहत मे हम उम्मीदें जोड़ लेना चाहते है लकीरों मे ही हम किस्मत का लेखा पढ़ पाते है
लकीरों कि दुनिया जिसमें जीवन को समज लेना चाहते है लकीर मे जीवन को समज लेना हर बार मुश्किल होता है लकीर के अंदर नई सोच का एहसास अलग होता है
लकीर ही तो अपना जीवन तय करती है उस लकीर को समज लेना हर बार ज़रूरी नज़र आता है लकीर अलग सोच जिन्दा कर जाती है हर बार वही जीवन कि राह बताती है
लकीर जो जीवन को नई दिशा दे जाती है लकीर जो असर जीवन पर कर जाती है वही तो जीवन कि हर दिशा नये तरह से दिखाती है लकीरे जो कहती है वही कर दिखाती है
हमारी हर बात उनके सामने अधूरी रह जाती है लकीरों से ही तो हमारी दुनिया बनती है हमारी किस्मत बदल जाती है लकीर चाहती है बस वही बातें जीवन मे पूरी हो जाती है बाकी बातें अधूरी रह जाती है
लकीर जीवन को बनाती है वही तो जीवन को अलग मतलब  दे जाती है लकीर ही तो हमारी किस्मत चलाती है हम पसंद करे या ना करे वह अलग रंग जीवन मे दिखाती है
लकीर जो जीवन के किस्मत को अलग तरीक़े से बताती है पर हमने अक्सर देखा है लकीर अलग तरीक़े से हमे हर बार जीना सिखाती है अक्सर कुछ तो बातें अलग जीवन मे होती है
लकीर हमारे जीवन को रोशनी दे जाती है अगर लकीर को चाहे तो हमे जीवन कि उम्मीद मिल जाती है लकीर मे ही जीवन कि ताकद हर बार होती है
लकीर के अंदर ही जीवन का इतिहास छुपा होता है जो जीवन को अलग तरह का एहसास हर बार देता है क्योंकि लकीर मे ही हर बार हमारी किस्मत छुपी होती है

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