Tuesday, 1 September 2026

कविता. ५९६८ हर किनारा कोई नयी।

                            हर किनारा कोई नयी।

हर किनारा कोई नयी सरगम सुनाता है आशाओं को लम्हों की आहट देकर आगे बढता जाता है तरानों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी कोशिश सुनाता है दिशाओं को कदमों की राह देकर आगे बढता जाता है अंदाजों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी उमंग सुनाता है एहसासों को उजालों की सुबह देकर आगे बढता जाता है इशारों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी पहचान सुनाता है नजारों को जज्बातों की दास्तान देकर आगे बढता जाता है अल्फाजों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी आवाज सुनाता है धाराओं को अरमानों की परख देकर आगे बढता जाता है लहरों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी सोच सुनाता है अफसानों को बदलावों की आस देकर आगे बढता जाता है इरादों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी मुस्कान सुनाता है अंदाजों को लहरों की कहानी देकर आगे बढता जाता है सपनों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी आहट सुनाता है राहों को दिशाओं की महफिल देकर आगे बढता जाता है अदाओं की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी दास्तान सुनाता है खयालों को एहसासों की उम्मीद देकर आगे बढता जाता है इशारों की पुकार दिलाता है।

हर किनारा कोई नयी तलाश सुनाता है बदलावों को आवाजों की धून देकर आगे बढता जाता है अरमानों की पुकार दिलाता है।


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कविता. ५९६८ हर किनारा कोई नयी।

                            हर किनारा कोई नयी। हर किनारा कोई नयी सरगम सुनाता है आशाओं को लम्हों की आहट देकर आगे बढता जाता है तरानों की पुकार...