Monday, 12 October 2015

कविता २५३. ग़लत राह कि मंज़िल

                                    ग़लत राह कि मंज़िल
जब जब हम आगे बढ़ते अलग अलग दुनिया पाते है जिसे परख चुके है उस दुनिया से भी बेहतर दुनिया सोच पाते है जीवन मे अपनी सोच से आगे जाते है वह जीवन को अपनी मर्ज़ी से जी पाते है
जब जब नई सोच आगे बढ़कर लोग अपनाते है जीवन के हर मोड़ पर वह आगे बढ़ते जाते है जीवन कि हर कदम पर जो उम्मीद वह पाते है वह पहले से भी ज़्यादा और हर बार बेहतर पाते है
जीवन के हर मोड़ पर हम कुछ तो समज पाते है और जीवन कि कश्ती के अंदर हम दुनिया को ले जाते है हर सोच को हम हर अगले कदम मे समज लेना चाहते है आगे बढ़ते क़दमों कि आहट हम समज लेना चाहते है
पर मुश्किल तो बात यहीं है कि कभी कभी हम आगे नहीं बढ़ना चाहते है हम उस सोच से जिसे हम परखे दूर ही रहना चाहते है जीवन को हर बार हम आगे लेना चाहते है
धीरे धीरे से चुप के से उसे समज लेना चाहते है पर जब गलत राहों से लोग आगे बढ़ जाते है तब हम जीवन को उस राह समज लेना नहीं चाहते हर बार कि तरह दिल से चाहते आगे बढ़ना नहीं चाहते है
हम चाहते है पीछे रहना हम बस वह ग़लत राह नहीं चाहते है चाहे तो जीवन भर पीछे रह जाये पर ग़लत राह कि मंज़िल देखना कभी भी हम नहीं चाहते है हम तो वह मंज़िल चाहते है जो सही होती है
जीवन मे हर बार कुछ तो असर होता है मंज़िल का ग़लत असर जो हमे जीवन देता है उस से बेहतर तो मंज़िल का दूर होना होता है जो जीवन को समज लेना आसान नहीं होता है
हर मंज़िल को पाना आसान होता है जीवन मे जब उसका असर होता है जीवन के अंदर नया एहसास सही राह से आता है उसे समज लेना ज़रूरी हर बार होता है
ग़लत राह के अंदर हमेशा दुःखों का एहसास होता है जब ग़लत चीज़ों को समज लेना अहम होता है उन्हें ना करने कि बजह समज लेना हर बार दूर रखने के लिए ज़रूरी होता है
राहों के अंदर अलग अलग सोच का एक असर होता है पर ग़लत सोच से चलने कि बजह हार जाना मुश्किल नहीं होता है सही राह पर चलना हर बार ज़रूरी होता है

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