Friday, 2 October 2015

कविता २३०. सोच को आजमाना

                                                                सोच को आजमाना
सिर्फ़ कह देने से बात सच्ची नहीं होती बात समजे बिना जिन्दगी अच्छी नहीं लगती बात के अंदर अलग मतलब का एहसास जो भर देती है वह जिन्दगी जीवन मे जीते नहीं तब तक सच्ची नहीं होती है
जो जीवन को हर मोड़ पर परख ले वह दुनिया जीने के लिए काफ़ी नहीं होती पर जीवन को जब समजे तो उस सोच मे सच्चाई जब तक जी नहीं लेते वह जीवन कि सच्चाई नहीं बनती
सोच तो बस एक बंद लिफाफा है जिसे खोले बिना जीवन मे उसका मतलब नहीं बन पाता बंद खत कि सच्चाई जीवन को जो साँसें देती है वह बात आसानी से नहीं बनती
छुपी हुई बातों कि नई कहानी हर बार जीवन पे कुछ ना कुछ असर तो ज़रूर करती है बातों कि हर कहानी जीवन मे आसान नहीं होती कहना आसान होता है पर कहानी आसान नहीं बनती
क्योंकि जब तक सबके सामने न आजमायी जाये बातें काफ़ी नहीं होती जब आँखों देखी ना हो जाये सिर्फ़ कानों सुनी हमारे जीवन के हर मोड़ पर काफ़ी नहीं होती
जीवन को हर बार हम हक़ीक़त से आज़मा लेते है उसे समज लेने कि बात जीवन मे काफ़ी नहीं होती उसे जीना ज़रूरी है क्योंकि जिन्दगी जीना यह बात आसानी कि नहीं होती
हर हक़ीक़त मे चीज़ों का होना ज़्यादा अहम होता है पर लोगों का विश्वास सिर्फ़ कहने पर कभी कभी बैठ जाता है वहीं बात और वहीं सोच जीवन को साँसें दे जाती है वहीं सोच हमारी दुश्मन है बनती
कुछ सोच जो मन को छू ले उसे आज़मा लेता है ज़्यादा ज़रूरी होता है जीवन को परख लेना हर पल सोच नई देता है सोच को समज लेना जीवन मे हर बार ज़रूरी होता है
सोच के अंदर नया एहसास होता है जो जीवन मे जिन्दा होने से जीवन को आसानी से समज लेता है पर कभी कभी सोच मे ही जीवन भरा होता है पर अगर लोग उसे ना आजमा ले तो उसका क्या मतलब होता है
तो जीवन तभी कोई मतलब लाता है जब जीवन को समज लेना हमें आता है सोच को जीवन का हिस्सा बनाओ क्योंकि वही हमें समज आता है 

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