Wednesday, 16 March 2016

कविता ५६२. खुशियाँ और नफरत के किनारे

                                              खुशियाँ और नफरत के किनारे
किसी बात को भुलाने कि जब नौबत आती है वह नफरत कि जगह खुशियाँ होती है यही तो जीवन कि गलत राह होती है पर उस पर ही दुनिया चलती है
पर आजकल यही हमारी दुनिया सोचती है हमे सही दिशाओं का इन्तजार रहता है खुशियों को भूल जाने से जाने क्यूँ हमे एतराज होता है
बातों के हर बार अलग मतलब जीवन मे अक्सर निकल आते है बातों मे ही तो जीवन के किस्से छुपे होते है जो जीवन को आगे ले जाते है
हर बात के अंदर अलग अलग एहसास होते अगर प्यारे एहसासों को साथ मे रखो तो दुनिया सुंदर बन जाती है जीवन को साँसे दे जाती है
खयालों मे नफरत कि नही बस खुशियों कि जरुरत होती है आखिर खुशियाँ ही हमारी जिन्दगी होती है जीवन मे जरुरी होती है
जीवन मे हर बार हमे बस उम्मीदे मिल जाती है वही राह जीवन मे सही होती है जो हमे आगे हर बार ले कर जाती है
खुशियाँ और नफरत दोनों किनारों पर ही तो होती है हमे हमारी कश्ती सही किनारे लगानी होती है खुशियाँ ही हमे ढूँढनी होती है
जीवन कि गाडी हर बार अलग अलग सोच दे कर आगे बढती है सोच को परख लेने कि हर बार हमे जरुरत होती है बस खुशियाँ रखने कि ही जरुरत होती है
पर गलती से अक्सर जीवन मे यह बात हम भुल जाते है नफरत ही तोहफा बन कर जीवन का साथ निभाने चली आती है
नफरत हर बार गलत सोच ही होती है अगर उसे अपने पास रखने कि आदत हमे हो जाती है क्योंकि हमारी कश्ती अक्सर गलत किनारे पर रुक जाती है

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