Sunday, 11 June 2023

कविता. ४८३४. खयालों कि पुकार से।

                                     खयालों कि पुकार से।

खयालों कि पुकार से दिशाओं कि लहर को निशानी देती है आशाओं को जज्बातों कि सुबह एहसास दिलाती है लम्हों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से आवाजों कि धून को तलाश देती है लहरों को अल्फाजों कि कोशिश पहचान दिलाती है इशारों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से तरानों कि सुबह को आस देती है नजारों को दिशाओं कि समझ सरगम दिलाती है कदमों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से अरमानों कि उमंग‌ को राह देती है तरानों को अरमानों कि सौगात बदलाव दिलाती है किनारों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से इरादों कि कोशिश को लहर देती है उजालों को बदलावों कि सोच दास्तान दिलाती है दिशाओं कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से आशाओं कि सरगम को मुस्कान देती है उम्मीदों को दास्तानों कि कहानी अरमान दिलाती है खयालों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से अदाओं कि परख को अरमान देती है जज्बातों को आशाओं कि सौगात तलाश दिलाती है लहरों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से राहों कि सोच को उम्मीद देती है दिशाओं को सपनों कि कोशिश अफसाना दिलाती है बदलावों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से अंदाजों कि आस को उमंग देती है दास्तानों को आवाजों कि धून पहचान दिलाती है अफसानों कि रोशनी देकर जाती है।

खयालों कि पुकार से नजारों कि सुबह को अल्फाज देती है किनारों को तरानों कि बदलाव परख दिलाती है अंदाजों कि रोशनी देकर जाती है।

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