Sunday, 28 May 2023

कविता. ४८२०. किनारों कि पुकार अक्सर।

                               किनारों कि पुकार अक्सर।

किनारों कि पुकार अक्सर सपनों के इरादे देती है दास्तानों को अदाओं कि सुबह कोशिश दिलाती है लहरों कि सरगम संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर नजारों के तराने देती है कदमों को उजालों कि सोच अहमियत दिलाती है लम्हों कि रोशनी संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर जज्बातों के सहारे देती है दिशाओं को कदमों कि आस बदलाव दिलाती है जज्बातों कि सोच संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर अरमानों के नजारे देती है आशाओं को लहरों कि राह तलाश दिलाती है उजालों कि पहचान संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर आशाओं के उजाले देती है तरानों को उम्मीदों कि समझ अल्फाज दिलाती है इशारों कि सौगात संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर अंदाजों के दास्ताने देती है इरादों को आशाओं कि पहचान सपना दिलाती है अदाओं कि कोशिश संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर लहरों के इशारे देती है कदमों को सपनों कि आस सरगम दिलाती है बदलावों कि मुस्कान संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर खयालों के अफसाने देती है दिशाओं को कदमों कि सोच लहर दिलाती है आशाओं कि सुबह संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर अरमानों के राहें देती है अल्फाजों को अदाओं कि परख रोशनी दिलाती है कदमों कि आहट संग आवाज सुनाती है।

किनारों कि पुकार अक्सर इरादों के उम्मीदें देती है अंदाजों को बदलावों कि मुस्कान खयाल दिलाती है नजारों कि पहचान संग आवाज सुनाती है।

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