Friday, 17 July 2026

कविता. ५९३२ अल्फाज की महफिल संग।

                       अल्फाज की महफिल संग।

अल्फाज की महफिल संग दास्तानों से उम्मीद तलाश दिलाती है अंदाजों को सपनों की पुकार खयाल दिलाती है कदमों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग जज्बातों से पहचान कोशिश दिलाती है दिशाओं को बदलावों की राह सपना दिलाती है अदाओं को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग अरमानों से लहर उजाला दिलाती है किनारों को एहसासों की पहचान कहानी दिलाती है तरानों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग दिशाओं से जज्बात मुस्कान दिलाती है नजारों को आहट आवाज दिलाती है बदलावों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग लहरों से सोच सहारा दिलाती है जज्बातों को इशारों की तलाश उम्मीद दिलाती है धाराओं को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग अफसानों से रोशनी इरादा दिलाती है उजालों को लम्हों की उमंग समझ दिलाती है दास्तानों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग राहों से अहमियत सपना दिलाती है इरादों को अरमानों की सोच खयाल दिलाती है लम्हों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग आशाओं से सुबह कोशिश दिलाती है धाराओं को उम्मीदों की पहचान सरगम दिलाती है खयालों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग अदाओं से पुकार आवाज दिलाती है तरानों को अफसानों की सौगात सुबह दिलाती है राहों को आस दिलाती है।

अल्फाज की महफिल संग खयालों से उमंग इशारा दिलाती है लहरों को नजारों की कोशिश सरगम दिलाती है अदाओं को आस दिलाती है।


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कविता. ५९३२ अल्फाज की महफिल संग।

                       अल्फाज की महफिल संग। अल्फाज की महफिल संग दास्तानों से उम्मीद तलाश दिलाती है अंदाजों को सपनों की पुकार खयाल दिलाती है ...