Monday, 28 September 2026

कविता. ५९९५ हर आस संग कोई।

                                हर आस संग कोई।

हर‌ आस संग कोई पहचान इशारा दिलाती है किनारों को अरमानों की सोच खयाल दिलाती है लम्हों को अल्फाजों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई दास्तान तराना दिलाती है उजालों को उम्मीदों की परख मुस्कान दिलाती है दिशाओं को जज्बातों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई आवाज नजारा दिलाती है दास्तानों को अदाओं की धून एहसास दिलाती है तरानों को इशारों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई सरगम रोशनी दिलाती है जज्बातों को बदलावों की पुकार आहट दिलाती है लहरों को खयालों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई कोशिश सुबह दिलाती है अफसानों को कदमों की आवाज रोशनी दिलाती है नजारों को लम्हों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई सोच उम्मीद दिलाती है एहसासों को किनारों की उमंग तराना दिलाती है अंदाजों को सपनों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई तलाश बदलाव दिलाती है दिशाओं को धाराओं की सौगात अल्फाज दिलाती है राहों को अंदाजों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई लहर सपना दिलाती है नजारों को आवाजों की अहमियत कहानी दिलाती है आशाओं को बदलावों की समझ दिलाती है।

हर आस संग कोई परख लम्हा दिलाती है अफसानों को कदमों की सोच मुस्कान दिलाती है अरमानों को लहरों की‌ समझ‌ दिलाती है।

हर आस संग कोई सुबह इरादा दिलाती है बदलावों को जज्बातों की पुकार सरगम दिलाती है धाराओं को उजालों की‌ समझ‌ दिलाती है।

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