Saturday, 13 July 2024

कविता. ५२३२. एक आवाज जब किनारे को।

                         एक आवाज जब किनारे को।

एक आवाज जब किनारे को छू कर चलती है जज्बातों को अंदाजों की आस एहसास दिलाती रहती है अरमानों को कदमों की पहचान देकर जाती है।

एक आवाज जब उम्मीदों को छू कर चलती है लहरों को इशारों की कहानी अफसाना दिलाती रहती है खयालों को नजारों की सुबह देकर जाती है।

एक आवाज जब कोशिश को छू कर चलती है कदमों को अदाओं की तलाश सरगम दिलाती रहती है सपनों को एहसासों की उमंग देकर जाती है।

एक आवाज जब तराने को छू कर चलती है आशाओं को एहसासों की आहट सोच दिलाती रहती है उजालों को इशारों की समझ देकर जाती है।

एक आवाज जब सपने को छू कर चलती है लम्हों को अरमानों की पुकार बदलाव दिलाती रहती है कदमों को खयालों की मुस्कान देकर जाती है।

एक आवाज जब उजाले को छू कर चलती है दास्तानों को राहों की सौगात अहमियत दिलाती रहती है किनारों को अल्फाजों की तलाश देकर जाती है।

एक आवाज जब इरादे को छू कर चलती है अफसानों को इशारों की परख सहारा दिलाती रहती है बदलावों को दिशाओं की पहचान देकर जाती है।

एक आवाज जब अफसाने को छू कर चलती है अंदाजों को कदमों की सरगम आस दिलाती रहती है लहरों को अदाओं की सहारा देकर जाती है।

एक आवाज जब अरमानों को छू कर चलती है बदलावों को दिशाओं की सोच सुबह दिलाती रहती है नजारों को उम्मीदों की पुकार देकर जाती है।

एक आवाज जब लहरों को छू कर चलती है एहसासों को राहों की मुस्कान अफसाना दिलाती रहती है अफसानों को उजालों की आहट देकर जाती है।

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