Monday, 15 June 2026

कविता. ५९०४ अफसानों की सोच संग।

 

                       अफसानों की सोच संग।

अफसानों की सोच संग आशाओं से जुडकर मुस्कान पुकार दिलाती है अंदाजों को नजारों की सौगात तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग तरानों से जुडकर सुबह आवाज दिलाती है इशारों को जज्बातों की पहचान तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग किनारों से जुडकर कोशिश अंदाज दिलाती है उजालों को सपनों की पुकार तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग दास्तानों से जुडकर उमंग आस दिलाती है अरमानों को लम्हों की कहानी तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग आवाजों से जुडकर धून एहसास दिलाती है उम्मीदों को धाराओं की समझ तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग राहों से जुडकर सरगम खयाल दिलाती है किनारों को इशारों की आहट तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग अल्फाजों से जुडकर सोच परख दिलाती है आशाओं को कदमों की आस तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग अंदाजों से जुडकर समझ अल्फाज दिलाती है लहरों को दिशाओं की महफिल तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग एहसासों से जुडकर आस अंदाज दिलाती है अदाओं को धाराओं की सौगात तलाश दिलाती है।

अफसानों की सोच संग खयालों से जुडकर सुबह बदलाव दिलाती है आवाजों को सपनों की कोशिश तलाश दिलाती है।

No comments:

Post a Comment

कविता. ५९०४ अफसानों की सोच संग।

                         अफसानों की सोच संग। अफसानों की सोच संग आशाओं से जुडकर मुस्कान पुकार दिलाती है अंदाजों को नजारों की सौगात तलाश दिलात...