Wednesday, 8 April 2026

कविता. ५८३६. उजालों की सुबह से जुडकर।

                       उजालों की सुबह से जुडकर।

उजालों की सुबह से जुडकर एहसासों की कोशिश तलाश दिलाती है किनारों को आशाओं की महफिल सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर आवाजों की धून बदलाव दिलाती है दिशाओं को दास्तानों की पहचान सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर जज्बातों की रोशनी उम्मीद दिलाती है अफसानों को कदमों की आस सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर लहरों की सौगात मुस्कान दिलाती है अंदाजों को सपनों की उमंग सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर अरमानों की राह खयाल दिलाती है तरानों को इशारों की अहमियत सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर धाराओं की सोच अरमान दिलाती है जज्बातों को नजारों की समझ सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर अल्फाजों की मुस्कान उमंग दिलाती है बदलावों को दिशाओं की राह सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर किनारों की आस पहचान दिलाती है सपनों को अंदाजों की सौगात सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर इरादों की आहट पुकार दिलाती है उम्मीदों को कदमों की पहचान सरगम दिलाती है।

उजालों की सुबह से जुडकर खयालों की आवाज सपना दिलाती है अल्फाजों को धाराओं की सोच सरगम दिलाती है।

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कविता. ५८३७. किनारों से जज्बातों की।

                          किनारों से जज्बातों की। किनारों से जज्बातों की रोशनी तलाश दिलाती है अदाओं की सरगम अक्सर आशाओं को एहसास दिलाती है। ...