Monday, 13 April 2026

कविता. ५८४१. दास्तान की मुस्कान से जुडकर।

                     दास्तान की मुस्कान से जुडकर। 

दास्तान की मुस्कान से जुडकर आशाओं से एहसास दिलाती है किनारों को कदमों की आहट संग खयाल सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर दिशाओं से तलाश दिलाती है उजालों को जज्बातों की रोशनी संग उम्मीद सुनाकर जाती है।

दास्तान की‌ मुस्कान से जुडकर इरादों से पहचान दिलाती है अरमानों को लम्हों की समझ संग अफसाना सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर उजालों से पुकार दिलाती है बदलावों को धाराओं की सौगात संग कोशिश सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर तरानों से अल्फाज दिलाती है इशारों को अदाओं की सोच संग आस सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर अंदाजों से सरगम दिलाती है नजारों को आशाओं की सुबह संग तलाश सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर लहरों से इशारा दिलाती है आवाजों को अंदाजों की अहमियत संग इरादा सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर कदमों से तराना दिलाती है सपनों को इशारों की सौगात संग परख सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर लम्हों से बदलाव दिलाती है अफसानों को एहसासों की राह संग आवाज सुनाकर जाती है।

दास्तान की मुस्कान से जुडकर आवाजों से धून‌ दिलाती है इशारों को बदलावों की उम्मीद संग नजारा सुनाकर जाती है।



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कविता. ५८४१. दास्तान की मुस्कान से जुडकर।

                     दास्तान की मुस्कान से जुडकर।  दास्तान की मुस्कान से जुडकर आशाओं से एहसास दिलाती है किनारों को कदमों की आहट संग खयाल सुन...