Monday, 1 December 2025

कविता. ५७०८. दास्तान को कदमों की।

                            दास्तान को कदमों की।

दास्तान को कदमों की सौगात उजाला दिलाती है किनारों को अंदाजों की पहचान कोशिश दिलाती है लहरों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की रोशनी आवाज दिलाती है लम्हों को एहसासों की सौगात अहमियत दिलाती है इशारों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की सुबह उमंग दिलाती है जज्बातों को बदलावों की रोशनी अफसाना दिलाती है खयालों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की आस अरमान दिलाती है राहों को नजारों की पहचान किनारा दिलाती है अल्फाजों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की जज्बात मुस्कान दिलाती है किनारों को सपनों की राह अंदाज दिलाती है बदलावों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की सोच खयाल‌ दिलाती है धाराओं को इशारों की तलाश समझ दिलाती है आशाओं को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की आवाज इशारा दिलाती है तरानों को अल्फाजों की दुनिया सरगम दिलाती है उजालों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की परख आहट दिलाती है आशाओं को लम्हों की कहानी इरादा दिलाती है अंदाजों को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की उम्मीद सहारा दिलाती है अरमानों को किनारों की परख तलाश दिलाती है दिशाओं को पुकार दिलाती है।

दास्तान को कदमों की सरगम सोच दिलाती है खयालों को इशारों की सौगात मुस्कान दिलाती है अदाओं को पुकार दिलाती है।

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कविता. ५७५९. दिशाओं को दास्तानों संग।

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