Monday, 31 October 2022

कविता. ४६११. जज्बात संग कोई सुबह कि।

                                  जज्बात संग कोई सुबह कि।

जज्बात संग कोई सुबह कि उमंग जताता है कदमों कि आहट अक्सर अरमानों कि पुकार सुनाती है लम्हों से आशाओं कि आस दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि सपना जताता है किनारों कि सोच अक्सर अंदाजों कि सौगात सुनाती है तरानों से उम्मीदों कि पुकार दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि लहर जताता है खयालों कि समझ अक्सर बदलावों कि पहचान सुनाती है आवाजों से अंदाजों कि कोशिश दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि अरमान जताता है अदाओं कि परख अक्सर इशारों कि किनारा सुनाती है उजालों से कदमों कि अल्फाज दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि उम्मीद जताता है नजारों कि राह अक्सर नजारों कि सौगात सुनाती है बदलावों से लम्हों कि अंदाज दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि खयाल जताता है सपनों कि सौगात अक्सर इरादों कि बदलाव सुनाती है राहों से आशाओं कि आवाज दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि परख जताता है इशारों कि पहचान अक्सर आवाजों कि धून सुनाती है अफसानों से दास्तानों कि सरगम दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि कोशिश जताता है उम्मीदों कि समझ अक्सर इशारों कि धून सुनाती है अदाओं से इरादों कि लहर दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि सोच जताता है अरमानों कि पुकार अक्सर दिशाओं कि समझ सुनाती है तरानों से आवाजों कि बदलाव दिलाती है।

जज्बात संग कोई सुबह कि पहचान जताता है नजारों कि सौगात अक्सर उम्मीदों कि सोच सुनाती है एहसासों से राहों कि समझ दिलाती है।

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