Saturday, 16 January 2016

कविता ४४३. अपने मन को समजना

                                                          अपने मन को समजना
अपने मन को समज ले तो वही काफी है क्यों समजाए दूसरे को क्योंकि हम अच्छेसे खुदको ही समज ले तो ही जीवन के लिए यह सोच काफी होती है
मन के अलग अलग कोने में कुछ नई ताकद होती है जिसे समझ लेने की जरूरत होती है दूसरे समझले या ना वह बाते मायने नहीं रखती है
मन को तो अपने जीवन की चाबी हम दे चुके होते है उस चाबी की हमे जरूरत होती है मन को अपने परखो यही तो हमारी जरूरत हर बार होती है
जीवन में हर बात को समज लेना जीवन की वह साँस जिन्दा हो जाती है जो जीवन को अलग उम्मीद दे जाती है मन को हर बार अलग एहसास देती है
मन में कई बाते जो जीवन को बदल देती है उन्हें समज लेना ही जीवन के हर पल की जरूरत होती है दूसरे से ज्यादा हमे अपने मन की जरूरत होती है
पर अक्सर दूसरों के खातिर उसे चोट देने की एक बुरी आदत हम में अक्सर होती है उसे छोड़ दे तो हमारे मन पर गनीमत होती है जो उम्मीद देती है
मन के कई कोनों में जीवन की अलग अलग सोच जिन्दा रहती है जो जीवन को हर बार रोशनी दे जाती है जीवन में उम्मीद की ज्योत हर बार होती है
जीवन की तो हमारी शुरुआत होती है मन के अंदर अलग अलग सोच की प्यास होती है जो मन को नया एहसास हर बार हर मोड़ पर अक्सर दे जाती है
हम अपने मन को समजे इतनी ही हमारी प्यास होती है पर जीवन की धारा में वह अधूरी रह जाती है क्योंकि हम मन को समज नहीं पाते है
शायद हम दूसरों को परखते रहते है यही मुश्किल जीवन में हर बार होती है जो जीवन को अक्सर नई रोशनी दे जाती है वह जीवन में उम्मीद की कहानी सुनाती है 

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