Wednesday, 29 July 2015

कविता १०२. मालिक और गुलाम

                                                              मालिक और गुलाम
जब जब हम आगे बढ़ते है  ईश्वर आप  हमें समज लेना चाहे कोई साथ दे या ना दे आप बस हमारे साथ ही रहना आप को दिल में पाया है
किसी ओर दिशा में आप को ढूढ़ने का ख्वाब भी मन में कभी ना आया है जब जब हम आगे बढ़ते है आप बस हमारे साथ साये की तरह रहना मदद्त नहीं सिर्फ साथ ही काफी है
यही है हमारे मन का कहना हम जाने आप हर जगा हो पर फिर भी जब जब हम डर जाते है उस पल आप हमारे साये में ही रहना क्युकी बाकि सब अलग हो जाते है
बस साया है वह बहना जो कभी दूर नहीं जाता है यही है हमारे मन का हर बार कहना जब जब उम्मीदों में अंदर जीवन का जिन्दा रहना है
ईश्वर तेरे संग है अक्सर जीवन में खुशियो का हमेशा है रहना इसलिए नहीं की जीवन में तकलीफे ना हो पर इसलिए के तेरे साथ में गम भी लागे खुशियों का एक गहना ईश्वर आप बस साया बन के रहना है
हम नहीं चाहते है आप कुछ दे हमें बस आपका साथ हर पल चाहते है जो हमें आगे  बढाये चाहे तो सिर्फ आपकी छाया इस सर पर हम चाहते है
जब जब हम जीवन में हर मोड़ पर कुछ ना कुछ समजना चाहते है राहों पर जब आगे बढ़ते है उन पर वह हार भी जाये तो मन में खुशियाँ चाहते है
वही खुशियाँ मन में अक्सर आ जाती है जब आप होते हो ईश्वर तो गम के अंदर तरह तरह की उम्मीद जगाते है सारे गम छोड़ कर हम आपके सोच में खुश ही रहने लग जाते है
जब जब अपना साया बनके ईश्वर आ जाये किसी गम से हम नहीं डरते क्युकी आप हमें कुछ दे या ना दे पाये आप हमारे साथ तो चलते रहते है
आपकी हर पुकार पर हमें हाजीर होना है आप  मालिक हो हम बस गुलाम है पर फिर मालिक साथ रहे यह गुलाम का कहना है
क्युकी शायद  कभी कभी आप इस गुलाम  का काम महसूस ही नहीं करते है और खुद ही चल देते है और हमें बुलाना ही शायद आप भुला ही देते है 

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