Saturday, 12 September 2015

कविता १९० टूटे हुए ख्वाब

                                   टूटे हुए ख्वाब
टूटे हुए सारे ख्वाबों को पाना मुमकिन तो नहीं पर जीवन को समज लेते है हम उसे जीना समजते ही नहीं ख्वाबों कि कोई चाबी जीवन मे होती नहीं उन्हें फिर से जी लेने के सपने से हम डरते है
कई किसम के मतलब जीवन के बहोत सारे सामने आते है हम जीवन समज लेते है नये मतलब को समजते  है टूटे हुए ख्वाबों को कभी कभी हम जिन्दा भी कर लेते है
ख्वाबोंकी अलग दुनिया और उनका अलग मतलब रखते है हम जीवन को हर बार नये तरीक़े से समज लेते है जीवन की हर धारा का एक अलग मतलब हम ढूँढ़ते है
जीवन के अंदर बातों के कई मोड़ हम खुद से ही ढूँढ़ लेते है पर हम अगर वह सारे मोड़ ढूँढ़ लेते है तो फिर हम क्यूँ न कभी पुराने ख्वाबों के सही मतलब  नहीं ढूँढ़ते
जीवन मे तो अक्सर कई मोड़ आते जाते है पर बड़ी मुश्किल होती है जब हम पुराने ख्वाब फिर से जी जाते है हर मोड़ पर हम उन ख्वाबों के ख़ातिर कुछ तो मेहनत करते है
कभी कभी टूटे ख्वाब जिन्दगी दे जाते है जब जब हम जीवन कि नयी शुरूवात पुराने कोनों से करते अगर सही साथ मिल जाये तो हार को जीत मे बदलते है
अगर ध्यान से देखे तो हार ज़रूरी होती है वह जीवन से हारनेका खौफ ही भुला देती है अगर एक बार हार लो तो एक चीज़ समज जाती है कौन अपना असली साथी है
जीवन के हर मोड़को समजना बाकी है हार मे कब तक जीवन हार से बच सकेंगे हम जब के हार भी हमारा साथी है जो धीरे धीरे जीवन को समजा देती है
कि जीत से भी ज़्यादा ज़रूरी हार होती है वह हमे अक्सर देती सच्चाई कि ज्योती हार से पता चलता है जीवन मे कैसे आगे बढ़ने कि ज़रूरत होती है
जीवन को परखो तो हार ज़रूरी होती है क्योंकि जब हम अपनी सच्ची सोच पर पहले चले तो हार होती है बाद मे लढकर ही जीवन मे जीत हासिल होती है हार ही हमारी सही सोच के जीत कि पहली होती है

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