Thursday, 24 September 2015

कविता २१४. आजमाना

                                                              आजमाना
जब जब कोई बात हम समज जाते है जाने क्यों हम जीवन में उसे दूसरे को समजाना चाहते है जब जब हम जीवन को ठीक से परख लेते है
जाने क्यों हम जीवन को सबको समजाना चाहते है जीवन के अंदर जो अलग सोच होती है जिसे हम मन से परखना चाहते है
जीवन के अंदर हम अलग ख़याल रखते है जो सारे ख़याल जिन्दा होते है उन्हें हम समजना चाहते है पर अफ़सोस तो इस बात का है
की हम उन्हें समजना कम और समजाना ज्यादा चाहते है अगर ख़याल हमारे है तो क्यों ना हम उन्हें खुद ही समजे पर हम दुनिया को हर बार समजाना चाहते है
दुनिया के कई रंग है जिन्हे हम दिल से समजना चाहते है पर समजाने के लिए हम इतना वक्त गवाते है जीवन की हर सोच को जिसको हम जीना चाहते है
उस सोच के अंदर नई शुरुआत होती है पर उसे परखने की जगह हम उसे दूसरों को समजाने के कोशिश में आजमाना भूल जाते है
आखिर आजमाना ही जीवन में जरुरी होता है हर पल वही तो आगे बढ़ना जरुरी होता है जो खुद आगे बढ़ता है वही जरुरी होता है
अक्सर जरुरी होता है सबके लिए क्योंकि सही सोच ही तो हमें आगे ले जाती है वही हमें आगे ले जाती है जीवन दे जाती है उम्मीद दे जाती है
जीवन के हर सोच में एक नई शुरुआत होती है जिसके सहारे जिन्दगी आगे बढ़ती जाती है जब हम उम्मीदों के सहारे कुछ करते है
तभी तो हम जीवन में जीत जाते है जब उसे समज जाते है और उसे आजमाते है तभी तो उसे जी लेते है और उसे अक्सर उस पल समज जाते है 

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