Wednesday, 16 December 2015

कविता ३८०. फूल और कलियाँ

                                        फूल और कलियाँ
हर फूल कि अलग कहानी होती है जब तक कली खिलती नही वह कहाँ हमे समज आती है कली तो हमसे हर चीज छुपा जाती है कली ही तो हर बात छुपा जाती है
फूल का रंग भी कली छुपा लेती है कली हर बार मासूम सी दिखती है पर वह कहाँ रंग दिखाती है कली मे रंग कभी दिखता है फूल के खिलते ही रंग सही हो जाते है
कली जीवन को बाद मे रंग दिखाती है फूल के खिलने पर ही दुनिया को एहसास दे जाती है कली से ज्यादा सच्चाई फूलों मे नजर आती है क्योंकि आधी छुपी बात कहाँ नजर आती है
जो छुपकर बैठी चीज सिर्फ परख लेते है तो ही जीवन को वह पेहचान मतलब दे जाती है पर उस चीज को परख लेना एक मुश्किल बात नजर आती है
जो जीवन को मतलब और होश दिलाती है फूल मे अलग अलग रंग वह हर बार दे जाती है कली तो हर मोड पर कुछ ना कुछ अंदर रखती है उसे वह कहाँ दिखा पाती है
फूलों के अंदर दुनिया सामने आती है कली मे वही दुनिया छुपी नजर आती है जो साफ दिखे तो जीवन को नई दिशा मिल जाती है जब दुनिया को समजे तो रोशनी आती है
कली से ज्यादा फुलों मे दुनिया रंग दे जाती है फुलों के अंदर खुशियाँ हर बार रोशनी लाती है कली से ज्यादा खुशियाँ फूलों मे आसानी से नजर आती है
कली तो बहोत कुछ बताती है पर उसकी छुपी बाते फूलों के अंदर खुल कर निखर आती है पर फिर कली जीवन मे  कुछ इस तरह से एक नई उम्मीद लाती है
कि कली और फूल दोनों कि जरुरत मन को मेहसूस होती है क्योंकि दोनों मे जीवन को अलग अलग खुशियाँ हर बार मिलती है जिसे हर पल हम समजे उस मन मे उम्मीद खुल कर दिखती है
फूल और कलियाँ जिसमे जीवन को  अलग तरह का मतलब दिखता है उन्हे परख लो तो जीवन मे खुशियाँ नजर आती है रोशनी मिलती है जीवन कि धारा ही बदल जाती है

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